पटना: आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के 16वां स्थापना दिवस पर “ज्ञान का चश्मा” बना आकर्षण का केंद्र, दर्शक सोचने को हुए मजबूर

PATNA: आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के 16वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत हास्य-व्यंग्य नाटक “ज्ञान का चश्मा” ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। लगभग 12 मिनट के इस नाटक में आधुनिकता और परंपरा के बीच चल रहे वैचारिक संघर्ष को मंच पर जीवंत रूप में दर्शाया गया। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल को सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से जोड़ने के उद्देश्य से किया गया था। नाटक की शुरुआत सूत्रधार (आदित्य) के व्यंग्यात्मक संवाद से हुई, जिसने दर्शकों को ज्ञान के असली स्वरूप और उसके श्रेय को लेकर चल रही बहस से परिचित कराया।

कार्यक्रम का आयोजन आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय अंतर्गत स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन की विभागाध्यक्ष  डॉ. मनीषा प्रकाश के मार्गदर्शन में किया गया। इस नाटक के लेखक डॉ. संदीप कुमार दुबे तथा निर्देशक डॉ. अनुपम प्रियदर्शी रहे, जिनके निर्देशन में विद्यार्थियों ने शानदार प्रस्तुति दी।नाटक में “प्रोफेसर डॉ. क्रेडिट हैकर @ मनी हंगर” (सौरभ कुमार यादवेंदु) के माध्यम से पश्चिमी सोच पर कटाक्ष किया गया, जो भारतीय ज्ञान को अपनाकर उसका श्रेय लेने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। वहीं “उपाधि” (रिया मेहता) के रूप में एक भारतीय शोध छात्रा ने आत्मविश्वास के साथ भारतीय परंपरा का पक्ष रखा। “मिस स्टेपनी” (मुस्कान कुमारी सिंह) के भोले लेकिन जिज्ञासु प्रश्नों ने नाटक को रोचक बनाया।

नाटक का एक प्रमुख आकर्षण “मिस सेल ऑफर” (नैना कुमारी) का पात्र रहा, जिसने ज्ञान को एक ‘प्रोडक्ट’ बनाकर बेचने की प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य किया। “आयुर्वेद, योग और मेडिटेशन” को ऑफर और सब्सक्रिप्शन के रूप में प्रस्तुत कर वर्तमान समय के बाजारीकरण पर सवाल खड़े किए गए। आचार्य अनंत (करण कुमार झा) के प्रवेश के साथ नाटक ने गंभीर मोड़ लिया, जहां भारतीय ज्ञान परंपरा की गहराई और वैज्ञानिकता को दर्शाया गया। उन्होंने योग को केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन के अनुशासन और आत्म-जागरण का माध्यम बताया। उनके संवादों ने दर्शकों को भारतीय संस्कृति के मूल्यों से जोड़ने का काम किया।

मंच के केंद्र में रखा “ज्ञान का चश्मा” सत्य और अहिंसा का प्रतीक बनकर पूरे नाटक का केंद्रीय बिंदु रहा। इस प्रस्तुति में संगीत संयोजन का कार्य  दुर्गेश कुमार तथा प्रोडक्शन मैनेजमेंट राजनंदिनी की भूमिका भी सराहनीय रही, जिन्होंने नाटक को प्रभावशाली बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कार्यक्रम के अंत में दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। यह नाटक न केवल मनोरंजन का माध्यम बना, बल्कि यह संदेश भी देने में सफल रहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा आज भी प्रासंगिक है और उसे पहचानने एवं संरक्षित करने की आवश्यकता है।

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